पुल के अभाव में जोखिम भरी जिंदगी, बुजुर्ग को ट्यूब से नदी पार कराते ग्रामीण, देखें वीडियो

कांकेर छत्तीसगढ़ // कांकेर जिले से एक दिल दहला देने वाला वीडियो सामने आया है, जिसने ग्रामीण इलाकों की बदहाल व्यवस्था को फिर उजागर कर दिया है। यह मामला कोयलीबेड़ा विकासखंड के हुरतराई क्षेत्र का है, जहां एक बुजुर्ग व्यक्ति को ग्रामीणों ने ट्यूब में बैठाकर नदी पार कराया। यह घटना उस वक्त हुई जब लोग नवाखाई पर्व मनाने के लिए सवलिबरस गांव जा रहे थे।
जोखिम भरा सफर, मजबूरी में लिया सहारा
वीडियो में साफ दिख रहा है कि बुजुर्ग व्यक्ति नदी पार करने में असमर्थ था। तेज बहाव और गहराई के चलते ग्रामीणों ने मजबूरी में एक ट्यूब का सहारा लिया और बुजुर्ग को उसमें बैठाकर नदी पार कराया। इस दौरान कई ग्रामीण नदी में उतरकर उसे खींचते और संभालते नजर आए। दृश्य जितना भावुक करने वाला था, उतना ही ग्रामीणों की बेबसी और व्यवस्था की खामियों को उजागर करने वाला भी रहा।
हर साल बरसात में दोहराई जाती है परेशानी
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यह स्थिति नई नहीं है। बरसात का मौसम आते ही हर साल उन्हें इसी तरह जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ती है। पुल के अभाव में छात्र-छात्राओं, मजदूरों, महिलाओं और बुजुर्गों को अपनी दैनिक जरूरतों के लिए भी नदी पार करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। कई बार बीमार मरीजों को भी इसी तरह जोखिम उठाकर अस्पताल तक ले जाना पड़ता है।
लंबे समय से पुल की मांग अधूरी
ग्रामीण बताते हैं कि वे वर्षों से पुल निर्माण की मांग कर रहे हैं। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से बार-बार गुहार लगाने के बावजूद अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गई। चुनावी मौसम में नेताओं के वादे तो मिलते हैं, लेकिन बरसात आते ही ग्रामीणों को फिर उसी मुसीबत से जूझना पड़ता है।
वीडियो वायरल, उठे सवाल
सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होते ही लोग प्रशासन और सरकार से सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर कब तक ग्रामीणों की जान को खतरे में डालकर उन्हें इस तरह नदी पार करनी पड़ेगी। यह वीडियो न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि प्रदेशभर में चर्चा का विषय बन गया है। यह घटना एक बार फिर ग्रामीण अंचलों में बुनियादी ढांचे की कमी को उजागर करती है। जहां शहरों में विकास और सुविधाओं की बातें होती हैं, वहीं ग्रामीण अंचल में लोग आज भी ट्यूब, नाव और रस्सी के सहारे नदी पार करने को मजबूर हैं। सवाल उठता है कि क्या 21वीं सदी में भी ग्रामीणों को अपनी जान जोखिम में डालकर जीना पड़ेगा या फिर उनकी समस्याओं का कोई स्थायी समाधान होगा।



