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कल से शुरू होंगे श्राद्ध, 21 सितंबर को सर्वपितृ अमावस्या…

पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए किया जाता है तर्पण,पितृ पक्ष के दौरान मांगलिक कार्य करना माना गया है वर्जित,तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन माने गए हैं श्राद्ध के तीन प्रमुख अंग।

कोरबा // हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का समय अत्यंत पवित्र माना गया है। पंचांग के अनुसार इस वर्ष पितृ पक्ष की शुरुआत 7 सितंबर से होगी और इसका समापन 21 सितंबर को सर्वपितृ अमावस्या के दिन होगा। इस अवधि में पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध जैसे विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। पितृ पक्ष के दौरान मांगलिक कार्य करना वर्जित माना गया है।
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि भारतीय संस्कृति अनादिकाल से कृतज्ञता, श्रद्धा और परंपराओं की डोर में गुंथी हुई है। इसी जीवन दर्शन में पितृ-पूजन की परंपरा का विशेष महत्व है। ऋषियों ने माता-पिता और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता को पितृ ऋण कहा है। श्राद्ध उसी परंपरा की अभिव्यक्ति है। यह केवल कर्मकांड नहीं बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का अवसर है। श्राद्ध शब्द का मूल श्रद्धा है। इसका अर्थ है कि पूर्वजों के लिए जो भी कार्य निष्ठा, समर्पण और भाव से किया जाए, वही श्राद्ध कहलाता है। उन्होंने कहा कि श्राद्ध के तीन प्रमुख अंग तर्पण (जल, तिल, अर्पण), पिंडदान और ब्राह्मण भोजन माने गए हैं। श्राद्ध केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक समरसता का माध्यम है। यह परंपरा परिवार को पूर्वजों से जोड़ती है और पीढ़ियों के बीच भावनात्मक सेतु का कार्य करती है। भारतीय संस्कृति में तीन ऋण बताए गए हैं। देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। श्राद्ध करके पितृ ऋण की निवृत्ति होती है। इससे पितर प्रसन्न होकर वंशजों को सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। आज प्रवासी भारतीय भी ऑनलाइन माध्यमों से श्राद्ध अनुष्ठान कराते हैं। प्रो. शर्मा ने कहा कि इसे आधुनिक दृष्टिकोण से भावनात्मक हीलिंग और पारिवारिक जुड़ाव का साधन भी माना जा सकता है। श्राद्ध का वास्तविक सार श्रद्धा और कृतज्ञता में निहित है। युवा पीढ़ी के लिए संदेश यही है कि आधुनिकता की दौड़ में परंपराओं को न भूलें। पूर्वजों का स्मरण केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली आध्यात्मिक शक्ति होती है।


पितृ पक्ष की तिथियां


7 सितंबर : पूर्णिमा श्राद्ध
8 सितंबर : प्रतिपदा श्राद्ध
9 सितंबर : द्वितीया श्राद्ध
10 सितंबर : तृतीया व चतुर्थी श्राद्ध
11 सितंबर : पंचमी व महाभरणी श्राद्ध
12 सितंबर : षष्ठी श्राद्ध
13 सितंबर : सप्तमी श्राद्ध
14 सितंबर : अष्टमी श्राद्ध
15 सितंबर : नवमी श्राद्ध
16 सितंबर : दशमी श्राद्ध
17 सितंबर : एकादशी श्राद्ध
18 सितंबर : द्वादशी श्राद्ध
19 सितंबर : त्रयोदशी श्राद्ध
20 सितंबर : चतुर्दशी श्राद्ध
21 सितंबर : सर्वपितृ अमावस्या

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