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अधिवक्ता कमलेश साहू लीगल नोटिस” का डर दिखाकर पत्रकारों की आवाज दबाने की कर रहा कोशिश…

अधिवक्ता पर गंभीर आरोप — धमकी, दबाव और विवादों का लंबा इतिहास


कोरबा जिले में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पत्रकारिता की स्वतंत्रता और कानून के दुरुपयोग पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि एक अधिवक्ता द्वारा अपने भाई के खिलाफ प्रकाशित खबरों से बौखलाकर पत्रकारों को धमकाने, डराने और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की कोशिश की जा रही है।

मामले की जड़ क्या है?

बताया जा रहा है कि कबाड़ चोरी के आरोपों में घिरे मुकेश साहू के खिलाफ कुछ पत्रकारों ने खबरें प्रकाशित की थीं। इन खबरों में नाम सीधे तौर पर न लेते हुए भी इशारों में पूरे मामले को उजागर किया गया था।
इसी से नाराज होकर उनके अधिवक्ता भाई कमलेश साहू ने पत्रकारों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
व्हाट्सएप कॉल के जरिए दबाव बनाने का आरोप
एक न्यूज पोर्टल के पत्रकार के अनुसार, अधिवक्ता ने उसे व्हाट्सएप कॉल कर:
बार-बार नाम और पूरा पता पूछने की कोशिश की
दिए गए पते के बावजूद घर का लोकेशन जानने पर जोर
जर्नलिज्म की पढ़ाई और योग्यता पर सवाल उठाए
“लीगल नोटिस भेजने” के नाम पर डराने का प्रयास किया
पत्रकार द्वारा बार-बार यह कहने के बावजूद कि नोटिस के लिए दिया गया पता पर्याप्त है, अधिवक्ता लगातार अतिरिक्त जानकारी मांगते रहे — जिसे स्पष्ट रूप से दबाव की रणनीति माना जा रहा है।

पहले भी सामने आ चुका है विवाद

यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी:
पत्रकार योगेश सलूजा को गाली-गलौच जान से मारने की धमकी दी गई थी।इस पूरे घटनाक्रम का ऑडियो वायरल हुआ, जिसके बाद अधिवक्ता के खिलाफ अपराध दर्ज किया गया।

गंभीर आरोपों का पुराना रिकॉर्ड


कमलेश साहू पर पहले से ही कई संगीन आरोप दर्ज बताए जा रहे हैं:
एक महिला के साथ छेड़छाड़ और मारपीट का मामला
फर्जी जमानतदार पेश कर कोर्ट को गुमराह करने का आरोप
इन मामलों में कार्रवाई के बाद करीब 2 महीने जेल में भी रह चुके हैं
इसके बावजूद, स्थानीय लोगों का कहना है कि उनके व्यवहार में कोई सुधार नजर नहीं आ रहा।

पुराना पैंतरा: पहले पुलिस, अब पत्रकार निशाने पर?


सूत्रों का दावा है कि अधिवक्ता का यह तरीका नया नहीं है।
आरोप है कि:पहले पुलिस अधिकारियों पर झूठे केस दर्ज कर दबाव बनाया गया
ताकि कबाड़ चोरी के मामलों में कार्रवाई रुक जाए
अब उसी रणनीति को पत्रकारों पर लागू किया जा रहा है
यानी, जो भी उनके खिलाफ आवाज उठाता है — उसे कानूनी प्रक्रिया के नाम पर डराने की कोशिश की जाती है।
बड़े मीडिया संस्थानों की चुप्पी पर सवाल
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि:
कई बड़े मीडिया संस्थानों ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित नहीं किया
जिससे यह सवाल उठ रहा है कि:
क्या कहीं न कहीं डर का माहौल है?
या फिर दबाव में आकर खबरों को रोका जा रहा है?

पत्रकारों की दो टूक चेतावनी

पत्रकार समुदाय ने इस पूरे मामले पर स्पष्ट रुख अपनाया है:
*“अगर हमने कोई गलती की है, तो कानूनी नोटिस भेजिए — हम जवाब देंगे।*
लेकिन धमकी, गाली-गलौच और दबाव किसी भी हालत में स्वीकार नहीं।”
साथ ही यह भी कहा गया कि:
कलम की आवाज को दबाया नहीं जा सकता सच्चाई सामने आती रहेगी।

समाज और कानून के लिए बड़ा सवाल

क्या कानून का जानकार ही कानून का डर दिखाकर दूसरों को चुप कराने की कोशिश करेगा?
क्या यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला नहीं है?

प्रशासन इस मामले में क्या सख्त कदम उठाएगा?

यह मामला अब सिर्फ एक अधिवक्ता या एक पत्रकार का नहीं रहा —
यह सच्चाई बनाम दबाव की लड़ाई बन चुका है।
कोरबा में उठी यह आवाज अब पूरे प्रदेश के पत्रकारों के लिए एक संदेश है:
“डर के आगे सच्चाई नहीं झुकती।”

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