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मां की आराधना या गरबा का कारोबार? पास व्यवस्था पर जितेंद्र सारथी ने उठाए सवाल, बोले—‘भक्ति से बड़ी नहीं हो सकती व्यावसायिक सोच’…

कोरबा में गरबा आयोजनों की व्यवस्था पर बहस तेज, कपल एंट्री, प्रवेश शुल्क और धार्मिक मर्यादा को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता ने जताई चिंता

कोरबा, छत्तीसगढ़। नवरात्रि का पर्व मां दुर्गा की आराधना, शक्ति की उपासना और श्रद्धा का प्रतीक है। गरबा और डांडिया इसी धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े आयोजन हैं, लेकिन कोरबा जिले में कुछ गरबा आयोजनों की पास व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं। वन्यजीव संरक्षण से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता **जितेंद्र सारथी** ने गरबा के नाम पर प्रवेश पास जारी करने, कपल एंट्री और धार्मिक आयोजनों में आर्थिक लेन-देन की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए आयोजकों से आत्ममंथन करने की अपील की है।

जितेंद्र सारथी का कहना है कि नवरात्रि का मूल उद्देश्य मां दुर्गा की आराधना, भक्ति और सांस्कृतिक परंपराओं को सहेजना है। ऐसे में धार्मिक आयोजनों में श्रद्धालुओं की भागीदारी आर्थिक कारणों से सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि जब आयोजन मां की भक्ति और आराधना के लिए किए जाते हैं, तो आम श्रद्धालुओं के सामने प्रवेश पास खरीदने की बाध्यता क्यों होनी चाहिए?

🔸 मां की भक्ति के लिए पास क्यों? आर्थिक बोझ पर उठाए सवाल

जितेंद्र सारथी ने कहा कि धार्मिक आयोजनों में गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की भी समान भागीदारी होनी चाहिए। आस्था किसी की आर्थिक स्थिति देखकर तय नहीं होती। यदि गरबा आयोजनों में सुरक्षा, भीड़ नियंत्रण और अन्य व्यवस्थाओं के लिए प्रवेश संबंधी नियम आवश्यक हैं, तो उन्हें पारदर्शी, न्यायसंगत और जनहित को ध्यान में रखकर लागू किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि व्यवस्थाओं के संचालन के लिए सहयोग लेना अलग बात है, लेकिन धार्मिक आस्था के नाम पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ने की स्थिति पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आयोजकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आर्थिक कारणों से कोई श्रद्धालु धार्मिक आयोजन से दूर न रहे।

🔸 छोटी समितियों से सीखें बड़े आयोजक, जनसहभागिता को मिले प्राथमिकता

सारथी ने कहा कि जिले में कई छोटी समितियां सीमित संसाधनों के बावजूद बिना प्रवेश पास बेचे गरबा और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित कर रही हैं। ऐसी समितियां आपसी सहयोग, जनसहभागिता और श्रद्धा के बल पर परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं।

उन्होंने बड़े आयोजनों की समितियों से भी अपील की कि वे व्यवस्थाओं के साथ-साथ धार्मिक आयोजन की मूल भावना को प्राथमिकता दें। उनके अनुसार, पारदर्शिता और सामूहिक सहभागिता से ही ऐसे आयोजनों को व्यापक सामाजिक समर्थन मिल सकता है।

🔸 आरती के समय कम भीड़, गरबा शुरू होते ही उमड़ती भीड़—क्या बदल रही हैं प्राथमिकताएं?

धार्मिक आयोजनों में लोगों की भागीदारी के स्वरूप पर सवाल उठाते हुए जितेंद्र सारथी ने कहा कि कुछ स्थानों पर माता की आरती के दौरान अपेक्षाकृत कम लोग दिखाई देते हैं, जबकि गरबा शुरू होते ही बड़ी संख्या में लोग पहुंच जाते हैं।

उन्होंने सवाल किया कि क्या नवरात्रि का उद्देश्य केवल मनोरंजन और नृत्य तक सीमित होता जा रहा है? उन्होंने स्पष्ट किया कि गरबा हमारी संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसका आयोजन अवश्य होना चाहिए, लेकिन इसके साथ मां दुर्गा की आराधना, आरती, भजन और धार्मिक परंपराओं को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।

सारथी के अनुसार, गरबा की वास्तविक सुंदरता तभी बनी रहेगी, जब मनोरंजन के साथ भक्ति और आध्यात्मिक भाव भी कायम रहेंगे।

🔸 धार्मिक मंचों पर अश्लीलता का आरोप, संस्कृति और मर्यादा बनाए रखने की अपील

जितेंद्र सारथी ने कुछ आयोजनों में कथित तौर पर अश्लील गीतों और आपत्तिजनक प्रस्तुतियों को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि धार्मिक मंचों पर प्रस्तुत किए जाने वाले गीत-संगीत और कार्यक्रमों की प्रकृति पर आयोजकों को गंभीरता से विचार करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि मां दुर्गा की आराधना के नाम पर आयोजित कार्यक्रमों में ऐसा वातावरण होना चाहिए, जो धार्मिक आस्था, भारतीय संस्कृति और महिलाओं के सम्मान के अनुरूप हो। मनोरंजन के नाम पर धार्मिक आयोजनों की मर्यादा की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।

🔸 गरबा समितियों से अपील—भक्ति, संस्कृति और सामाजिक एकता को दें प्राथमिकता

जितेंद्र सारथी ने जिले की सभी गरबा समितियों, श्रद्धालुओं और जागरूक नागरिकों से अपील की कि वे नवरात्रि के आयोजनों की पवित्रता और सांस्कृतिक गरिमा बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाएं।

उन्होंने कहा कि गरबा केवल नृत्य और मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा, सामूहिक सहभागिता और सामाजिक एकता का प्रतीक भी है। इसलिए आयोजनों में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें सुरक्षा और अनुशासन के साथ आम श्रद्धालुओं की भागीदारी, पारदर्शिता तथा धार्मिक मर्यादा का भी पूरा ध्यान रखा जाए।

अब सवाल यह है कि गरबा आयोजनों की चमक-दमक के बीच मां की आराधना, श्रद्धा और धार्मिक परंपराओं को कितनी प्राथमिकता मिल रही है? जितेंद्र सारथी द्वारा उठाए गए सवालों ने इस विषय पर चर्चा को एक नई दिशा दी है।

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